पंचायती राज व्यवस्था-आवश्यकता, महत्व, समस्या व सुझाव

 

ड़ी. एन. सूर्यवंशी, श्रीमती लक्ष्मी लेकाम

राजनीति शास्त्र, भा.प्र.दे.शास. स्नातकोŸार महाविद्यालय कांकेर  छ.ग.।

 

भारत जैसे देश में जहां 80ः प्रतिशत जनसंख्या गांवों में बसती है, वहां पंचायती राज के नाम से प्रसिद्ध ग्रामीण स्थानीय शासन का महत्व स्वतः सिद्ध है। पंचायत भारत के प्राचीनतम राजनीतिक संख्याओं में से एक मानी जाती है। 2 अक्टूबर 1952 की सामुदायिक विकास कार्यक्रम के शुभारंभ के साथ ही इस योजना का प्रारंभ माना जाता है। 2 अक्टूबर का दिन गांधीजी के जन्म तिथि होने के कारण चुना गया है। गाधीजी ग्रामों के हितों को सर्वाधिक महत्व प्रदान करते थे। वे ग्रामीण जीवन का पुनर्निर्माण ग्राम पंचायतों की पुनः स्थापना से ही संभव मानते थे। भारत के संविधान निर्माता भी इस तथ्य से भली भांति परिचित थे, अतः हमारी स्वाधीनता को साकार करने और उसे स्थायी बनाने के लिए ग्रामीण शासन अवस्था की ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया। हमारे संविधान में यह निर्देश दिया गया है कि राज्य ग्राम पंचायतों के निर्माण के लिए कदम उठाएगा और उन्हंे इतनी शक्ति और अधिकार प्रदान करेगा कि वे (ग्राम पंचायतें) स्वशासन की इकाई के रूप मंे कार्य कर सकें।

 

गांधीजी ने ठीक ही कहा थाः- ‘‘यदि गांव नश्ट होते हैं तो भारत भी नश्ट हो जायेगा। वह भारत भी नहीं होगा विश्व मंे उसका संदेश समाप्त हो जाएगा।’’

 

समस्या का चयनः- मैनं अपने सर्वेक्षण के अन्तर्गत पंचायती राज व्यवस्थ का विश्लेशण नामक समस्या का चयन किया है। राजनीति विज्ञान की छात्रा होने के कारण मेरी रूचि प्रारंभ से राजनीतिक अध्ययन में रही है। अतः अपने समाज की राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन की उत्सुकता मेरे मन में थी यह अवसर मुझे मिला मैनं अपनी पूर्ण जिज्ञासा को शांत करने के लिए इस समस्या का चयन किया।

 

उद्देश्यः- विषय के अध्ययन के उद्देश्य निम्नांकित हैः-

1.            पंचायती राज से पूर्व की व्यवस्था एवं पंचायत प्रणाली के बारे में जानकारी प्राप्त  करना।

2.            पंचायत के सदस्यों की सामाजिक एवं आर्थिक पृश्ठभूमि के बारे में जानना।

3.            पंचायती राज के प्रति उनके विचार व पंचायत पद का संगठन ,अधिकार तथा कर्तव्य के बारे में जानना।

4.            पंचायत में आने वाले अपराध व पंचायत द्वारा दिये जाने वाले न्याय एवं दण्ड प्रक्रिया के बारे में जानना।

5.            पंचायतीराज की आवश्यकता, महत्व समस्या एवं सुझाव के बारे में जानकारी प्राप्त करना।

 

अध्ययन क्षेत्र:-पंचायतीराज के अध्ययन के लिए मैनं केशकाल विकास खण्ड को चुना है जो रायपुर जगदलपुर राश्ट्रीय राजमार्ग पर जगदलपुर से 126 कि.मी. दूर स्थित है। कोन्डागांव जिले के उत्तर पूर्व में स्थित केशकाल विकास खण्ड में 73 प्रतिशत आदिवासी, 4 प्रतिशत हरिजन एवं 23 प्रतिशत अन्य वर्ग के लोग निवास करते है। जो गोंड़ी ,हल्बी, छतीसगढ़ी व हिन्दी बोलते है। यहंा के निवासियों  का मुख्य व्यवसाय कृशि व मजदूरी करना है। 88 प्रतिशत लोग कृशि पर निर्भर रहते है।

 

निदर्शन का चयन:- अपने अध्ययन के लिए दैव निदर्शन पद्वति का प्रयोग किया है। इस हेतु केशकाल विकास खण्ड  के पंचायतों में से 20 पंचायत चुनकर उनमें से 20 सरपंच,20 उपसरपंच, एवं 20 पंच उत्तरदाताओं को मैनं अपने अध्ययन का आधार माना है।

 

उपकरण:- वर्तमान (पंचायती राज व्यवस्था ) समस्या के अध्ययन के लिए मैनं साक्षात्कार अनुसूचि का प्रयोग किया है।,क्योंकि इस क्षेत्र में शिक्षा का प्रतिशत न्यूनतम है। और एैसी दशा में प्रश्नावली जैसं उपकरण का प्रयोग शोध के हित में नहीं है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर मैने अनुसूचि को अध्ययन के लिए उपयोगी उपकरण के रूप में चुना। इससे मेरी उपस्थिति भी उत्तरदाता को पे्ररित करने तथा यथार्थ की जानकारी प्राप्त करने हेतु सहायक हुई। उत्तरदाता को अस्पश्ट लगने वाले प्रश्नों को समझा पाना भी इस पद्वति से संभव हुआ। इसके अतिरिक्त अवलोकन और साक्षात्कार का लाभ भी मैने अनुचूचि के साथ लिया।

 

तथ्य संकलन:- अध्ययन से संबंधित प्राथमिक तथ्यों का संकलन साक्षात्कार अनुसूचि के प्रयोग से तथा,अवलोकन एवं साक्षात्कार पद्वति के माध्म से किया गया हैं इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत अध्ययन भी प्राथमिक तथ्यों का आधार है। दैतीयक तथ्यों का संकलन संदर्भ ग्रंथों और संबंधित साहित्य तथा अन्स दैतीयक स्त्रों से किया गया है।

 

वर्गीकरण:- अध्ययन के अन्तर्गत प्राप्त सूचनाओं को सर्वप्रथम क्रम से लगाया फिर पुर्नपरीक्षण किया। तीसरे स्तर में सारणीयन के लिए आवश्यक सूचनाओं को उन सूचनाओं से अलग कर दिया जिन्हें लिखने में उपयोग में लया ला सकता है। इसके पश्चात सारणीयन योग सूचनाओं का वर्गीकरण करते हुए सरल सारणीयन किया और अंत में सम्पूर्ण सारणियनों में प्रतिशत निकाला गया।

 

हमारा जनतंत्र इस बुनियादी धारणा पर आधारित है कि शासन के प्रत्येक स्तर पर जनता अधिक से अधिक शासन कार्यों में हाथ बटाये और अपने पर शासन करने का उत्तरदायित्व स्वयं प्राप्त करंे। दूसरे शब्दों में ग्रामीण भारत के लिए पंचायती राज ही एक मात्र उपयुक्त योजना है। पंचायतें ही हमारे राश्ट्रीय जीवन की रीढ़ है। जिसमंे गणतंत्र के समस्त गुण पाये जाते हैं। प्रजातंत्र की सार्थकता विकेन्द्रीयकरण में है। यदि शक्तियां विकेन्द्रीकृत हो तो जनता की सहभागिता में वृ़िद्ध होगी और स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर हो जावेगा। स्थनीय लोगों को अपने आसपास की समस्याओं का ज्ञान तो होता ही है, उसका समाधान भी वे अच्छी तरह से कर सकेंगे। भारतीय संविधान मे किया गया 73वां संधोधन इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। लेकिन इसे सरकारी कार्यक्रम की तरह चलाया गया, परिणामस्वरूप यह योजना जनता को आकर्शित नहीं कर सकी। अतएव 1957 में बलवन्त राय मेेहता अध्ययन दल बनाया गया। मेेहता समिति ने जनभागी सहभागीता मंे वृद्धि के लिए लोकतांत्रिक विकेन्द्रीयकरण की योजना प्रस्तुत की इस योजना को 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में  पं. नेहरू ने उद्घाटित किया।

 

वर्तमान युग में प्रशासकीय जटिलतायें इतनी अधिक बढ़ी हैं कि प्रशासकीय कार्यों का एक ही स्थान पर होना संभव नही है। विकेन्द्रीकरण सत्ता शक्ति और उत्तरदायित्व को इस आधार पर विभाजित किया गया है कि मुख्यालय एवं क्षेत्रीय इकाईयों को समन्वित इकाइयों की तरह कार्य करने का सहज अवसर मिलता है। जो दोश हम केन्द्रीय व्यवस्था में पाते हैं उनसे स्वतः मुक्ति मिल जाती है। नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य में विकास की असीम संभावनाऐं लिए 01 नवम्बर 2000 को 26वंे राज्य के रूप में अस्तित्व मंे आया चूंकि पिछड़े राज्यों की श्रंेणी में रहने के कारण पंचायती राज व्यवस्था अधिक कारगर है। लेकिन नक्सली समस्या व नौकरशाहीयों की अहंम प्रवृत्ति के कारण पंचायती राज व्यवस्था को उतनी कारगर सफलता नहीं मिली जितना मिलना चाहिए था।

 

1985 में डाॅ. जी. वी. के. राव की अध्यक्षता मंे नियुक्त समिति ने नीति नियोजन और कार्यक्रम क्रियान्वयन के आधार बनाने और पंचायती राज संस्थाओं में नियमित चुनाव कराने की सिफारिस की। 1987 मंे पंचायती राज संस्थाओं की समीक्षा और उनमें सुधार के उपायों हेतु सुझाव देने के लिए डाॅ लक्ष्मीमल सिंधवी की अघ्यक्षता मंे नियुक्त समिति ने ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें अधिक आर्थिक संसाधन प्रदान करने की सिफारिश की थी। मई 1989 में राजीव गांधी सरकार द्वारा प्रचलित राज प्रणाली की अपर्याप्तताओं को दूर करने के लिए 64वां संशोधन विधेयक लोकसभा में विचारार्थ प्रस्तुत किया गया, जो पारित हो सकता लेकिन आज व्यवस्था से जुडी अन्य सभी संस्थाओं, राजनीतिक दलों की जो बाह्य दुर्दशा एवं धीमामस्ती है, वहीं पंचायतों में भी पाई जाती है। निहित स्वार्थी सत्ता के दलाल कुर्सी कि भूखे, राजनीतिकों के अराजक उद्दण्ड चमचे ही सक्रिय हैं। इस कारण पंचायत चुनावों के समय ही मारधाड़, हत्या, लूट तथा व सारे हथकण्डे सामने जाने लगते हैं जो सत्ता से सम्बंध रखने वाले अन्य बड़े संकायों के अवसर पर हुआ करते हैं। समर्थ प्रबल गुण्डातत्व ही आम ग्रामीणों को डरा धमकाकर पंच, सरपंच, आदि सभी कुछ चुने जाते हैं। इस चुने हुए प्रतिनिधियों मंे जिसका बहुमत अधिक होता है वे चारागाहों तथा ग्राम पंचायतों की भूमियों तक को स्वयं चट कर जाते हैं। न्याय के नाम पर मगरमच्छ व भेडिया न्याय होता है। आज भी पंचायतें हथकण्डों, गुण्डागर्दी का शिकार हो रही हैं। अतः इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए इन समस्याओं से उसे परे उठाना है। जिससे ग्रामीण जनता तथा गांवों का पंचायत विकास कर अपने उद्देश्य में फलीभूत हो सके।

 

आवश्यकता, महत्व और समस्या व सुझाव

प्राचीन काल से ही ग्राम पंचायतें ग्रामीण प्रशासन का महत्वपूर्ण अंग रही है। वस्तुतः पंचायतराज प्रणाली एक एैसी प्रणाली है। जिसमें हमें लोकतंत्र का सही ढांचा दिखाई देता है। मगर वर्तमान पंचायती संस्थाऐं इस मायने में कई महत्वपूर्ण अधिकार साधन और उत्तरदायित्व सौपे गये है। स्वाधीनता से पहले और उसके बाद भी इस बात के लिए आंदोलन होता रहा कि अगर हमें सच्चे अर्थों में अपने गांवों में स्वराज्य पहुंचाना है तो उसके लिए पंचायती राज की स्थापना करनी होगी इनका महत्व और उपयोगिता निम्नलिखित बातों से स्पश्ट हैंः-

 

पंचायती राज व्यवस्था एक एैसी व्यवस्था है, जो केन्द्रिय एवं राज्य सरकारो को स्थानीय समस्याओं के भार से हल्का करती है। उनके द्वारा ही शासकीय शक्तियों एवं कार्यो का विकेन्द्रीकरण किया जा सकता है। प्राजातांत्रिक प्रणाली में कार्यांे का विकेन्द्रीकरण करने पर इस प्रक्रिया में  शासकीय सत्ता गिनी चुनी संख्याओं में न रखकर गांव की पंचायत के कार्यकताओं के हाथों में पहुंच जाती है जिससे कि इनके अधिकार और कार्य क्षेत्र बढ़ जाते हैं। स्थानीय व्यक्ति स्थानीय समस्याओं को अच्छे ढंग से सुलझा सकते हैं। क्योकि वे लोग वहां की समस्या एवं परिस्थितियों को अधिक अच्छे से जानते है। इन स्थानीय पदाधिकारियों के बिना ऊपर से प्रारंभ किये हुए राश्ट्र निर्माण के क्रियाकलापों का सुचारूपूर्ण ढंग से चलना भी मुश्किल हो जाता है। इस प्रकार ग्राम पंचायत स्वस्थ प्रजातांत्रिक परम्पराओं को स्थापित करने के लिए ठोस आधार प्रदान करती है, शासन सत्ता ग्रामवासियों के हाथ में चली जाने से प्रजातांत्रिक संगठनों के प्रति उनकी रूचि जागृत होती है। पंचायती राज व्यवस्था के स्थापित होने से यह संख्या ग्राम व देश के लिए भावी नेतृत्व तैयार करती है। विधायकों तथा मंत्रियों को प्राथमिक अनुभव एवं प्रशिक्षण प्रदान करती है। जिससे वे ग्रामीण भारत की समस्या से अवगत हो। इस प्रकार गांवों में उचित नेतृत्व का निर्माण करने एक विकास कार्यो में जनता की रूचि बढ़ाने में पंचायतों का प्रभावी योगदान रहता है।

 

पंचायतें प्रजातंत्र का प्रयोगशाला है। यह नागरिको को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रयोग की शिक्षा देती है। साथ ही उनमें नागरिक गुणों का विकास करने में मदद करती है। पं. नेहरू ने स्वंय कहा था कि मैं पंचायती राज के प्रति पूर्णतः आशान्वित हूॅं मैं महसूस करता हूॅ कि भारत के संदर्भ में यह बहुत कुछ भौतिक एवं क्रांतिकारी है।प्रो. रजनी कोठारी के अनुसारः- इन संस्थाओ ने नये स्थानीय नेताओं को जन्म दिया है जो आगे चलकर राज्य और केन्द्रीय समाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियो से अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं। इस प्रकार इन संस्थाओं ने देश के राजनीतिक आधुनिकीकरण और सामाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्माण किया है तथा हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जन हिस्सेदारी में कृशि करके गांवों में जागरूकता उत्पन्न कर दी है।

 

समस्या

यद्यपि पंचायती राज व्यवस्था विभिन्न कारणों से ग्रामीण जनता मंे नई आशा और विश्वास पैदा करने में असफल रही है तथापि कुछ मायनों में यह संस्था अवश्य सफल रही है। वस्तुतः जब तक ग्रामीणों मंे चेतना नहीं आती तब तक ये संस्थाएंे सफल नहीं हो सकती। इसके समक्ष कुछ नई समस्याएॅं उत्पन्न हो गई हैं। जिसका निराकरण करना आवश्यक हैः-

1.            अशिक्षा और और ग्रामीणों की निर्धनता की विकट समस्या विकराल रूप  धारण कर चूकि है। ऐसी स्थिति मंे ग्रामीण समुदाय व नेतृत्व अपने संकीर्ण स्तरों से उपर उठ नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण व्यक्ति पंचायती राज की आवश्यक्ता और महत्व के बारे मंे अज्ञानतावश और अपनी निर्धनता के कारण कुछ भी नहीं कर पाते ।

2.            पंचायती राज की सफलता मंे दलगत राजनीति भी विशेश रूकावट रही है। पंचायतंे स्थानीय राजनीति का अखाड़ा बनती जा रही हैं। यदी हमारे राजनीतिक दल  पंचायतों के चुनावो में हस्तक्षेप करना बंद कर दे तो पंचायतों को दूशित राजनीति से बचाया जा सकता है। लोकतंत्र की सफलता की पहली शर्त सत्ता का स्थानीय संस्थाओं को हस्तांतरण करना है। यह तभी संभव है जब राजनीतिक प्रेरणा नीचे के स्तरों से शुरू हो और उच्च स्तर केवल मार्ग निर्देशन का कार्य करे। राज्य सरकारें इन संस्थाओं को अपने आदेशों का पालन करने वाला ऐजेन्ट मात्र न समझे। इसके लिए नौकरशाही की मनोवृत्ति में भी परिवर्तन की अवश्यक्ता है।

3.            संस्थाओं में आर्थिक स्त्रोत की कमी इन्हें शासकीय अनुदान पर ही जीवित रहना पड़ता है। अतः पंचायती राज संस्थाओं के संचालन के लिए आय के पर्याप्त एवं स्वतंत्र स्त्रोत प्रदान किये जाने चाहिए ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुढृढ़ बन सके।

4.            राजनीतिक जागरूकता की कमी भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। जो पंचायती राज समस्याओं की सफलता मंे रूकावट बनते हैं।

5.            स्थानीय निकायों पर स्थानीय, सांसदों, मंत्रियों और प्रभावशाली नेताओं के घरानों एवं रिश्तेदारों का कब्जा हो रहा है।

6.            स्थानीय निकायों पर संगठित माफियो और अपराधियों का कब्जा हो रहा है।

7.            महिला आरक्षण अर्थहीन हो गया है, क्योंकि सरपंच या प्रधान पति नामक एक नवीन प्रजाति का उदय हुआ है।

8.            वैमनस्यता मंे वृद्धि हुई है।

9.            स्थानीय निकायों के सदस्य स्वस्थ योजनाओं के बजाय अधिकतम निर्माण कार्यों में रूचि लेते हैं, पंचायतों के अधिकांश ठेकेदार स्वयं पार्शद या उनके रिश्तेदार हैं।

10.          छत्तीसगढ़ के अधिकांश पंचायत प्रतिनिधियों पर भ्रश्टाचार एवं गबन के मामले दर्ज हुए हैं।

 

इस प्रकार स्पश्ट है कि दूशित राजनीति संस्कृति के कारण पंचायती राज का क्रियान्वयन संतोशजनक नहीं है।

 

सुझाव

लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था गांवों से लेकर संसद तक प्रत्येक स्तर पर जनता के प्रतिनिधियों की अधिकतम भागीदारी हो। भारत में गांव आर्थिक समृद्धि के प्रतिक हैं। अतः देश तभी समृद्ध हो सकता है जबकि इसकी आत्मा के रूप मंे गांवों की प्रगति हो और गांवों का सर्वांगीण विकास पंचायतों की सफलता के द्वारा ही संभव है।

1.                           आज जरूरत इस बात की है कि योजनाओं के बेहतर समन्वय और क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाये। निगरानी तंत्र को मजबूत बनाया जाय और भ्रश्टाचार पर लगाम लगाने सख्त कार्यवाही की जाये।

2.            पूरा प्रशासनिक ढांचा निहित स्वार्थ के कब्जे में है।

3.            आवश्यकता इस बात की है कि ग्राम पंचायती व्यवस्था के नाम पर राजनीति के केन्द्र ना बन जाय यदि एैसा होता है तो पंचायतीराज व्यवस्था की जड.े हिल जायेगी औरसच्चे लोकतंत्र की आधार शिला ढह जायेगी ।

 

किसी भी देश , प्रदेश या गांव में पंचायती राज व्यवस्था तभी करगर हो सकती है जब उसके क्रियाकलापों को दलगत राजनीति से दूर रखा जाय यह भी सच है कि पंचायतीराज लोकतंत्र का यंत्र भी है। अतः पंचायतीराज संस्थाओं मूें व्याप्त गुटबन्दी को समाप्त करना भी इनके हित में ही होगा ।पंचायतों के चुनावों में मतदान को अनिवार्य किया जाना चाहिए। पंचायतों के वित्तिय हालत में भी सुधार अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारियों को भी पंचायतों के मित्र,सहयोगी और पथ प्रदर्शक के रुप में कार्य करना चाहिये। पंचायतीराज व्यवस्था को आम जनता और सरकार के बीच सेतु का काम करना चाहिए। आम जनता की भावना की अवज्ञा करके कोई भी देश लोकतंत्र की सफलता का दावा नहीं कर सकता।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची

1.            अग्रवाल ्रजी0 के0(1976) भारतीय सामाजिक संस्थायें: एस बीपीडी पब्लिशिंग आगरा ।

2.            गुप्ता ्र एम0एल0 तथा शर्मा ्रडी0 डी0(1989)सामाजिक संरचना एंव सामाजिक परिवर्तन: आगरा।

3.            जोशी्रओमप्रकार (डाॅ.) (1974) ग्रामीण एंव नगरीय समाजशास्त्र: दिल्ली ।

4.            मुखर्जी ्ररविन्द्रनाथ, (1989)्रभारतीय समाज एंव संस्कृति: दिल्ली ।

5.            विद्यामातंण्ड ्रसत्यव्रत (प्रो.) भारत की जनजाति तथा संस्थायंे देहरादून ।

 

 

 

Received on 17.07.2014

Revised on 20.08.2014

Accepted on 11.09.2014     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 5(3): July-September, 2014, 286-289